Divorce rules तलाक के बाद मां ही नहीं पिता को भी मिल सकती है बच्चे की कस्टडीDivorce rules तलाक के बाद मां ही नहीं पिता को भी मिल सकती है बच्चे की कस्टडी

Divorce rules New : महिला व पुरुष के आपसी वैवाहिक तनाव का सबसे ज्यादा असर बच्चों को देखने पर मिलता है। तलाक की स्थिति में छोटे बच्चे किसके पास रहेंगे, यह सबसे ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। तलाक, अलगाव या वैवाहिक विवाद की स्थिति में बच्चे की कस्टडी (अभिरक्षा) सबसे महत्त्वपूर्ण-संवेदनशील मुद्दो में से एक होती है।

सीनियर एडवोकेट वीरेंद्र सिंह ने बताया कि ऐसे मामलों में अदालत केवल माता-पिता के अधिकारों पर नहीं बल्कि बच्चे के सर्वोत्तम हित (Welfare of Child) पर ध्यान देती है।

बच्चे की शिक्षा-सेहत, भावनात्मक स्थिरता और समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए यह तय किया जाता है कि उसकी देखभाल किसके साथ बेहतर होगी। आइए जानें चाइल्ड कस्टडी से जुड़े कानूनी नियम क्या है?

बच्चे के हित के आधार पर होता है फैसला

बहुत छोटे बच्चों (विशेषकर शिशु या कम आयु के बच्चों) की अभिरक्षा अक्सर मां को दी जाती है, यदि कोई विशेष प्रतिकूल परिस्थिति न हो। लेकिन यह कोई कठोर नियम नहीं है। अंतिम निर्णय बच्चे के हित के आधार पर होता है।

देखभाल से लेकर विकास तक

1. चाइल्ड कस्टडी (अभिरक्षा) का अर्थ है कि तलाक, अलगाव या वैवाहिक विवाद की स्थिति में बच्चा किसके साथ रहेगा और उसकी देखभाल कौन करेगा। अदालतों में बच्चे का सर्वोत्तम हित यानि वेलफेयर ऑफ चाइल्ड सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है।

इसलिए अदालत केवल माता या पिता के अधिकार नहीं देखती बल्कि यह देखती है कि बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक विकास किसके साथ बेहतर होगा।

2. चाइल्ड कस्टडी कौन मांग सकता है?

माता, पिता और कुछ परिस्थितियों में दादा-दादी या अन्य अभिभावक (यदि बच्चे के हित में हो)

3. अदालत चाइल्ड कस्टडी तय करते समय किन बातों पर विचार करती है?

बच्चे की आयु, बच्चे की इच्छा (यदि वह पर्याप्त समझ रखने वाला हो), माता-पिता का आचरण, आर्थिक एवं शैक्षणिक वातावरण, बच्चे की सुरक्षा और भावनात्मक स्थिरता और कौन बेहतर देखभाल कर सकता है।

Divorce rules प्रकार जानें

1. फिजिकल कस्टडीः बच्चा एक अभिभावक के साथ रहता है।
2. जॉइंट कस्टडी: दोनों अभिभावक बच्चे के पालन-पोषण में भाग लेते हैं और समय साझा कर सकते हैं।
3. लीगल कस्टडी : शिक्षा-स्वास्थ्य आदि निर्णय लेने का अधिकार।

सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्धांत रखा है

सिर्फ इसलिए कि बच्चे की कस्टडी एक अभिभावक के पास है, दूसरे (जैसे नैसर्गिक पिता) को बच्चे से मिलने या संपर्क रखने से सामान्यतः नहीं रोका जाना चाहिए।

चाइल्ड कस्टडी के लिए धारा 7 और धारा 25, गार्जन एवं वार्ड्स एक्ट 1890 तथा हिंदू माता-पिता में प्रायः हिंदू माइनॉरिटी एवं गार्जनशिप एक्ट 1956 के प्रावधानों के तहत याचिका दायर की जाती है। यदि तलाक का मामला पहले से लंबित है, तो उस केस में भी अंतरिम या स्थायी कस्टडी की मांग की जा सकती है। ध्यान रखें कि याचिका उस फैमिली कोर्ट में दायर की जाती है, जहां बच्चा सामान्य रूप से रह रहा है।

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By Joginder Duhan

जोगेंद्र दूहन पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। पिछले आठ साल मैंने देश के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक जागरण में बतौर सीनियर रिपोर्टर के पद पर अपनी सेवाएं अखबार व डिजिटल मीडिया पर दी। इससे पहले मैंने अमर उजाला, दैनिक हरिभूमि, दैनिक आज समाज जैसे प्रमुख समाचार पत्रों में अपनी सेवाएं दे चुका हूं। अपनी पत्रकारिता जीवन में विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग एवं लेखन का व्यापक अनुभव अर्जित किया है।