न्यू सीरिज न्यूज, रोहतक : हरियाणा के रोहतक पीजीआईएमस (PGIMS Research) में युवाओं में नशे की प्रवृत्ति और लत को लेकर हुई रिसर्च में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। युवाओं में नशे की लत केवल व्यक्तिगत आदत या खुद के शौक से नहीं लगी है, सोशल मीडिया प्रभाव, दोस्तों का दबाव, मानसिक तनाव भी इसके बड़े कारण बन कर सामने आए हैं।
जी हां, हाल ही में रोहतक पीजीआईएमएस में 5 कॉलेजों के 50 विद्यार्थियों, 16 टीचर्स पर शोध किया गया था। शोध के दौरान विद्यार्थियों से डिटेल में बातचीत की गई। उनके व्यवहार, मानसिक स्थिति, सामाजिक परिवेश और जीवनशैली का विश्लेषण किया गया। इसमें यह पता लगाने का प्रयास किया गया कि कोई विद्यार्थी अबर नशा कर रहा है तो इसकी शुरुआत कैसे की थी और किन हालातों में की थी।
इसके बाद लत तक कैसे पहुंची। टीचर्स की राय ली गई। इस महत्वपूर्ण शोध ने कई चिंताजनक तथ्य उजागर किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन कारणों पर काम नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।

5 कॉलेजों में में हुई थी PGIMS Research
दरअसल PGIMS रोहतक के सामुदायिक चिकित्सा विभाग शोधकर्ता नरेंद्र कुमार ने वरूण कुमार के मार्गदर्शन में पीएचडीए के तहत शोध किया। नरेंद्र कुमार का कहना है कि उन्होंने पांच कॉलेजों में यह शोध किया गया। कॉलेजों में पढ़ने वाले 31 प्रतिशत युवा किसी न किसी तरह का नशा करते हैं। यह आंकड़ा इस तरफ इशारा कर रहा है कि हायर एजुकेशन इंस्टीच्यूट में भी नशे का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
PGIMS Research : दोस्ती के दबाव और फ्रेंड सर्कल में बैठकर होती है शुरुआत
पीएचडी शोध में सबसे बड़ी बात यह भी निकल कर सामने आई कि नशे की शुरुआत युवा अपनी मर्जी से नहीं करते, बल्कि जिस दोस्त या फ्रेंड सर्कल में उनका उठ ना-बैठना होता है, उस सर्कल के दोस्तों द्वारा पार्टी आदि में दबाव डालकर पीने के लिए कहा जाता है। कोई यारी दोस्ती की कसम खाता है तो कोई कोई शुरुआत में फ्री में पिलाता है।
कुछ युवा अपने फ्रेड सर्कल में खुद को फिट साबित करने की कोशिश में करते हैं।
यह खबर भी पढ़ें : Health News : सरकारी अस्पतालों में मिलेगा प्राइवेट जैसा इलाज, देखें सरकार का नया हेल्थ ब्लूप्रिंट
कई छात्र केवल “एक बार ट्राई करने” के उद्देश्य से नशा शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं को लगता है कि नशा करने से वे अपने दोस्तों के बीच अधिक स्वीकार्य बनेंगे, लेकिन यही सोच आगे चलकर उनके जीवन को गंभीर संकट में डाल देती है।
PGIMS Research : मानसिक तनाव और अवासद भी वजह
नरेंद्र कुमार ने बताया कि रिसर्च के अनुसार युवाओं पर बढ़ता पढ़ाई का दबाव भी कहीं न कहीं नशे की शुरुआत के लिए जिम्मेदार होता है। परीक्षा का तनाव, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाएं और व्यक्तिगत समस्याएं भी युवाओं को नशे की ओर धकेल रही हैं। युवाओं को लगता है कि शराब या नशा करने से उन्हें मानसिक राहत मिलेगी, इसलिए वह नशे का सहारा लेते हैं। शुरुआत में उन्हें इससे अस्थायी राहत महसूस होती है, लेकिन बाद में यही आदत मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करने लगती है।
PGIMS Research : सोशल मीडिया और फिल्मों का भी असर
पीएचडी शोध में यह भी सामने आया कि सोशल मीडिया, वेब सीरीज, फिल्मों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नशे को ग्लैमरस तरीके से प्रस्तुत किए जाने का युवाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। जब युवा अपने पसंदीदा कलाकारों या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को धूम्रपान, शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हुए देखते हैं, तो कई बार वे इसे आधुनिक जीवनशैली या स्टेटस सिंबल मानने लगते हैं। इससे नशे के प्रति झिझक कम होती है और प्रयोग करने की संभावना बढ़ जाती है।
टीचर्स ने दिए समाधान के सुझाव
पीएचडी शोध में शामिल शिक्षकों ने माना कि कॉलेजों में नियमित काउंसिलिंग, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम और जीवन कौशल आधारित प्रशिक्षण शुरू किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि छात्रों के साथ लगातार संवाद बनाए रखने से शुरुआती स्तर पर ही नशे की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है। मनोवैज्ञानिक नरेश जागलान बताते हैं कि अभिभावकों को बच्चों पर केवल पढ़ाई और करियर का दबाव बनाने के बजाय उनके मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक जरूरतों पर भी ध्यान देना चाहिए।
विशेषज्ञ व मनोवैज्ञानिक नरेश जागलान का कहना है कि नशे की समस्या केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती भी है। इसके समाधान के लिए स्कूलों, कॉलेजों, परिवारों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। यदि युवाओं को सही समय पर मानसिक सहयोग, सकारात्मक वातावरण और बेहतर मार्गदर्शन मिले तो बड़ी संख्या में उन्हें नशे की गिरफ्त में जाने से बचाया जा सकता है।

